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काव्य और संगीत

काव्य और संगीत दोनो ही ललित कलाएं हैं और एक दूसरे के पूरक हैं।काव्य सापेक्ष है और संगीत निरपेक्ष।दोनो की अपनी सीमाएं हैं।यदि अभिव्यक्ति की बात करें तो कई ऐसे स्थान होते हैं जहां अपने भावों को अभिव्यक्त करने के लिए भाषा या कविता का प्रयोग करने में असमर्थता होती है तो वहां संगीत के द्वारा वो कार्य सुगमता से संपन्न किया जा सकता है।जैसे युद्ध में विजय प्राप्त करने का उल्लास संगीत द्वारा सहज किया जा सकता है।वहीं किसी वस्तु को प्राप्त करने की इच्छा को हम भाषा या काव्य द्वारा प्रकट करेंगे,संगीत का प्रयोग नहीं करेंगे।इसके विपरित यदि काव्य और संगीत,दोनो संयुक्त रूप में किसी विषय की अभिव्यक्ति करें तो निःसंदेह वह बहुत ही सशक्त होगी।

पाश्चात्य विद्वान कार्लाइल के अनुसार संगीतमय विचार ही काव्य है।कविता मनोवेगपूर्ण और संगीतमय भाषा में मानव अंतःकारण की मूर्त तथा कलात्मक व्यंजना करती है। फूलर के मतानुसार काव्य शब्दों के रूप में संगीत तथा संगीत ध्वनि के रूप में कविता कहा जा सकता है। माधुर्य संयोजन में निहित होता है।जिस प्रकार निश्चित आंदोलन संख्या तथा नीतियों के गठन से मधुर स्वर की उत्पत्ति होती है,उसी प्रकार नियमित ध्वनि प्रकंपनो तथा वर्णों के आधार पर मधुर शब्द,मधुर छंद और मधुर अर्थ की उत्पत्ति होती है।वास्तव में रसलंकारयुक्त काव्य स्वर,ताल एवं लय आबद्ध रचना ही संगीत है।ऐसा संगीत हृदय की कोमलतम भावनाओ एवं स्पंदन को स्वरों में व्यक्त कर अपने प्रवाह से मानव की आंतरिक भावनाओं को भौतिक लोक से परे एक ऐसे लोक में ले जाने की क्षमता रखता है,जहां शिव है,सुंदर है और सत्य है।

लय संगीत का अनिवार्य तत्व है। इसमें भावों को संगठित करने की अद्भुत सामर्थ्य है।काव्य के लिए भी वह प्रायः अनिवार्य ही है।चित्त के समाहित होने से वह उत्पन्न होती है और संगीत भी चित्त की समाहिती से ही उद्भव होता है,अतः काव्य और संगीत का इस रूप में घनिष्ठ सम्बन्ध है तथा दोनों एक- दूसरे के पूरक हैं।

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