ठुमरी भारतीय शास्त्रीय संगीत की एक प्रमुख और भावपूर्ण शैली है, जो अपनी कोमलता, भावुकता और रसात्मकता के लिए जानी जाती है। ठुमरी में मुख्य रूप से प्रेम, विरह, भक्ति और राधा-कृष्ण की लीलाओं से जुड़े भावों को अभिव्यक्त किया जाता है। यह शैली उत्तर भारतीय शास्त्रीय संगीत का हिस्सा है और खयाल, ध्रुपद की तुलना में अधिक मुक्त होती है, जिससे गायक को अपनी भावनाओं को व्यक्त करने का अधिक अवसर मिलता है।
ठुमरी का उद्भव 19वीं शताब्दी में अवध के नवाब वाजिद अली शाह के दरबार में हुआ था। इसके दो प्रमुख रूप हैं – बनारसी ठुमरी और लखनवी ठुमरी। बनारसी ठुमरी में “बोल-बनाव” पर जोर दिया जाता है, जिसमें शब्दों के माध्यम से भावनाओं को अधिक गहराई से व्यक्त किया जाता है, जबकि लखनवी ठुमरी में नृत्य की मुद्राओं का भी समावेश होता है, जिससे इसे और अधिक आकर्षक बनाया जाता है।
ठुमरी गायन में प्रायः राग पीलू, खमाज, काफ़ी, भैरवी आदि का प्रयोग होता है, और इसे धीमी लय में प्रस्तुत किया जाता है। इसके गायन में तबले और हारमोनियम जैसे वाद्य यंत्रों का साथ होता है, जो इसकी मिठास को और भी बढ़ा देते हैं। ठुमरी का अंदाज़ सरल, मधुर और स्वाभाविक होता है, जो श्रोताओं के हृदय को छू लेता है।


