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तानसेन

महान कवि भक्त – प्रवर सूरदास जी ने तानसेन के विषय मे अपनी लेखनी से लिखा —

           विधना यह जिय जानिके, सेस ना दिन्हे कान।

           धरा मेरु सब डोलते, तानसेन की तान।।

अर्थात ब्रम्हा ने सोच समझकर ही शेष को, जो अपने फन के ऊपर पृथ्वी रोके हुए है, कान नहीं दिए, नहीं तो तानसेन की तान सुनकर शेष जी डोलते और पृथ्वी और पर्वत सब हिल जाते।

संगीताकाश मे तानसेन सूर्य की भांति देदीप्यमान। इस संगीत सम्राट का परिचय देना सूर्य को दीपक दिखाना है।

जन्मस्थान — तानसेन का मूल नाम ‘रामतनु’, ‘तन्ना मिश्रा’ था। आपका जन्म ग्वालियर से सात मील दूर बेहट गाँव में हुआ था। इनके पिता का नाम मकरंद पाण्डेय था। पाण्डेय जी सभी प्रकार से सुखी थे किन्तु संतान सुख से वंचित थे। कहा जाता है कि मुहम्मद गौस नमक ग्वालियर के एक संत फ़क़ीर के आशीर्वाद से उन्हें इस पुत्र कि प्राप्ति हुई तानसेन कि जन्मतिथि पर मतभेद है। अधिकतर विद्वानो का मत है क़ि इनका जन्म सन 1532 ईo में हुआ।

बाल्यकाल तथा शिक्षा — सुखी पिता के एकलौते पुत्र होने के कारण तन्ना बाल्यकाल में बहुत नटखट प्रवृत्ति के रहे।वे पशु पक्षियों क़ि बोलियों को हूबहू नकल कर लेते थे.। उनका स्वर भी अच्छा था। एक बार स्वामी हरिदास जी अपने शिष्यों के साथ तन्ना के खेतोँ से क़ि ओर निकले। स्वभाव के अनुसार तन्ना ने शेर क़ि आवाज़ क़ि गर्जना कर के उन्हें डराना चाहा। स्वामी जी इनके शरारतीपन में दबे गुण से प्रभावित और तन्ना को संगीत शिक्षा हेतु अपने साथ वृन्दावन ले गए। तन्ना क़ि संगीत शिक्षा 10 वर्षों तक चली। व्याहवारिक तथा अन्य शिक्षा उन्हें मुहम्मद गौस से मिली थी।

जीवनयापन— संगीत शिक्षा के पश्चात् तानसेन पिता कि अज्ञानुसार ग्वालियर में मुहम्मद गौस की सेवा में रहे। राजा मानसिंह की रानी मृगनयनी के यहाँ आते जाते रहे। मृगनयनी एक कुशल गायिका तथा उच्च संगीब्ट की ज्ञाता थी। अब तक तानसेन गायन में प्रसिद्ध हो चुके थे। अतः रीवा के राजा रामचंद्र ने इन्हे अपने यहाँ बुला लिया। यहाँ अपनी कला का विकास करते रहे। रीवा नरेश के यहाँ आपका बहुत सम्मान था। तानसेन भी अपने आश्रय दाता को अंत तक नहीं भूले। अकबर ने तानसेन की ख्याति सुनी। वह ऐसे गुणी कलाकार को अपने दरबार में लाने को आतुर हो गया। अकबर की इच्छा को टालना रीवा नरेश के लिए संभव नहीं था अतः दुखी मन से उन्होंने तानसेन को अकबर के दरबार के लिए विदा किया।अकबर ने भी तानसेन का उत्साह पूर्वक स्वागत किया तथा अपने दरबार के नौ रत्नो में स्थान देकर उनका समुचित सम्मान किया।

दीपक राग तथा मृत्यु — अब तानसेन के कला की चारो ऒर प्रश्नशा होने लगी थी। अतः दुष्ट प्रवृत्ति के व्यक्ति इनसे ईर्ष्या करने लगे। उन्होंने अकबर से तानसेन के दीपक राग की प्रश्नशा की और अकबर को उसे सुनने के लिए उत्तेजित किया। तानसेन ने अकबर को समझाने के प्रयत्न किये कि दीपक राग गाने से गायक का अंत भी निश्चित है। अकबर ना माना। तानसेन ने भरे दरबार में दीपक राग का गायन प्रारम्भ किया। इस साधक के सच्चे और साढ़े हुए स्वरों तथा राग के कुशलता पूर्वक गायन ने अपना चमत्कार दिखाना प्रारम्भ किया, ताप बढ़ने लगा। दरबार में रखे हुए दीपक जलने लगे। चारों ओर मानो अग्नि ज्वालाएं उठने लगी। दरबारी गण भागने लगे। स्वयं तानसेन शरीर दाह कि पीड़ा से भागने लगे। कहते है कि उनकी पुत्री सरस्वती ने मेघ राग गाकर वर्षा कराई और तानसेन के प्राण बचा लिए। इस घटना के बाद से ही तानसेन का स्वास्थ्य गिर गया और सन 1559 ईo में संसार को छोड़ कर स्वर्ग सिधार गये। उनकी मृत्यु पर मतभेद है।

विवाह एवं धर्म परिवर्तन — इनका विवाह मृगनयनी ने अपनी शिष्या हुसैनी के साथ करा दिया। कुछ लोगो के मत से इनके दो विवाह हुए थे। कहा जाता है कि तानसेन ने मुस्लिम धर्म स्वीकार कर लिया था। इस तथ्य तथा कारण पर मतभेद है। धर्म परिवर्तन निम्न कारणों से संभव माना जाता है– (1) मुहम्मद गौस के साथ रहने के कारण (2) हुसैनी से विवाह करने के कारण ( 3) अकबरी दरबार में रहने के कारण। कई विद्वानो के मत से तानसेन सदैव हिन्दू ही रहे कभी धर्म परिवर्तन नहीं किया। आचार्य डॉ बृहस्पति ने इसी मत के प्रमाण में कई सबाल तथ्य दिए हैँ। तानसेन के चार पुत्र सूरत सेन, शरत सेन, तरंग सेन तथा विलास खान तथा एक पुत्री सरस्वती थी।

कार्य— तानसेन उच्च कोटि के गायक थे। उनके समय में संगीत गौरवान्वित हुआ। साथ ही उन्होंने कुछ अविष्कार भी किये।

Sangeet of india पुस्तक में लिखा है “अद्भुत प्रतिभावान टेंसन ने तथाकथित 16000 रागो तथा 360 तालों में प्रत्येक के विशिष्ट लक्षणो का सूक्ष्म अध्ययन किया तथा अंतिम रूप से 200 राग तथा 12 तालो का निश्चियीकरण किया। तानसेन सदृश्य प्रवीण मस्तिष्क के अतिरिक्त अन्य कोई ऐसी गहन कला का इतना पूर्ण तथा सुव्यवस्थित रूप नहीं ला सकता था।

साहित्यिक—तानसेन एक अच्छे कवि भी थे और उन्होंने काव्य रचना भी की थी। उनके बनाये हुए ध्रुपद आज भी मिलते हैँ। ऐसा माना जाता है कि उन्होंने सैकड़ो ध्रुपद बनाये, वे ध्रुपद ही गाते थे। उन्होंने कई ध्रुपद को रागों में भी बाँधा।ध्रुपद गायन को उच्च शिखर पे पहुंचनाने का श्रेय मुख्य रूप से तानसेन को जाता है।

वाद्य—कहा जाता है कि तानसेन ने रबाब नमक वाद्य का अविष्कार किया। रबाब एक स्वर उत्पन्न करने वाला वाद्य था। इसका आजकल प्रचार नहीं है।

राग—तानसेन ने मुख्य कार्य रागों की रचना में किया। उन्होंने अनेक रागो की रचना की। उनके कुछ राग जैसे मियां की मल्हार, मियां की तोड़ी, मियां की सारंग, तथा दरबारी कन्हड़ा आदि आज भी प्रचार में हैँ। ये सभी राग आकर्षक एवं लोकप्रिय हैँ।

महानता— तानसेन एक महान गायक थे। कहते हैँ कि उनके उनके गायन में विलक्षण जादू था। वे अपने गायन के प्रभाव से हिरणो को बुला लेते थे, पानी बरसा देते थे,अग्नि जला देते थे। इन कथाओं पर कितना विश्वास किया जाए, कहा नहीं जा सकता किन्तु इतना स्पष्ट है कि तानसेन का स्वरों और रागों पर विलक्षण अधिकार था। वे एक असाधारण गायक थे।

तानसेन सत्य बोलते थे तथा गुरुभक्त थे। एक बार अकबर के पूछने पर अपने गुरु स्वामी हरिदास को सबसे अच्छा गायक बताया। हरिदास ना ती आगरा आते और ना ही गाना सुनाने को तैयार होते। अतः उनका गायन सुनने के लिए अकबर नौकर के भेष में तानसेन के साथ वृन्दावन पहुचे। तानसेन ने स्वयं गाना प्रारम्भ किया और गलती करने लगे। अपने शिष्य कि गलती सुधारने के लिए स्वामी जी स्वयं गाने लगे।

अकबर ने तानसेन से उतना अच्छा ना गा सकने का कारण पूछा। तानसेन ने स्पष्ट उत्तर दिया कि एक तो स्वामी जी मेरे पूज्य गुरु हैँ और दूसरे वे भगवान को प्रसन्न करने के लिए अपनी इच्छा से गाते हैँ और मैं मनुष्यों को प्रसन्न करने मनुष्य (अकबर ) कि इच्छा से गाता हूं। यह स्पष्ट उक्ति और गुरु भक्ति देख अकबर चुप हो गया।

इनकी मृत्यु पर अकबर को बहुत दुख हुआ तथा अकबर ने लिखा —

पीथल सू मजलिस गई तानसेन सू राग।

         हसबो रमबो बोलबो गयो बीरबल साथ।।

संगीत -क्षेत्र तानसेन का नाम अमर रहेगा। संगीतकाश में वे सूर्य के सामान सदैव प्रकाशित रहेंगे।

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