किसी एक मेल से दूसरे मेल अथवा थाट में प्रवेश करने वाले रागों को परमेल प्रवेशक राग कहते हैं। ‘पर’ का अर्थ है– दूसरा, मेल अर्थात् थाट और ‘प्रवेशक’ का अर्थ है प्रवेश करने वाला। इस प्रकार पर +मेल +प्रवेशक का अर्थ हुआ दूसरे मेल में प्रवेश करने वाला राग। परमेल प्रवेशक राग दर्शाते हैं कि अब इस थाट अथवा वर्ग के रागों का गायन – वादन समय समाप्त हो रहा है तथा अब अमुक वर्ग के समय का आगमन होना चाहता है।
इन रागों कि मुख्य विशेषता यह है कि इनमें समाप्त होने वाले तथा प्रारम्भ वाले दोनों ही मेल अथवा वर्गों की विशेषता विद्यमान रहती है। जैसे :- मुल्तानी राग में रे ग ध स्वर कोमल तथा म तीव्र लगता है। ग का कोमल होना ग नी कोमल वर्ग की विशेषता है जबकि कोमल रे, संधिप्रकाश या कोमल रे ध वाले वर्ग की विशेषता है। अतः मुल्तानी परमेल प्रवेशक राग है क्योंकि यह राग ग नी कोमल वाले वर्ग के गायन समय की समाप्ति तथा रे ध कोमल वाले वर्ग के आगमन की सूचना देता है। यह उसी समय पर गाया बजाया जाता है जिस समय काफ़ी थाट के भीमपलासी आदि रागों का समय समाप्त होकर पूर्वी थाट के रागों का समय आने वाला होता है।


