स्वर और वर्णो से विभूषित उस ध्वनि विशेष को राग कहते है,जो मन या चित्त का रंजन करे।
मतंग ने रागों का वर्गीकरण मुख्य रूप से ग्राम राग,भाषा राग और देशी राग के अंतर्गत किया है।शारंगदेव ने देशी रागों का विभाजन चार अंगों में किया हैं।जो इस प्रकार है,रागांग,भाषांग,क्रियांग और उपांग।इसके उपरांत विद्वानों ने राग रागिनी और मेल पद्धति नाम से दो वर्गीकरण बनाए।राग रागिनी पद्धति का अधिक प्रचार हुआ।मेल पद्धति दक्षिण भारत में ज्यादा प्रचलित है।
ग्राम रागों के लक्षणों में आलाप, करण या वर्तनी तथा आक्षिप्तिका को क्रम से बताया गया है। इसके अतिरिक्त 14 लक्षण और भी बताए हैं आश्रय भूत जाति,ग्राम विशेष ग्रह अंश न्यास अपन्यास, स्थाई आदि वर्ण,प्रसन्नादि एवम अन्य अलंकार,मुर्छना,विशेष स्वरों का निर्देश,स्वरों का अल्प्तवादी,रस,राग,ऋतु, समय,नाटक की संधि अथवा परिस्थिति विशेष और देवता।
राग निर्माण के लिए वर्ण,अंश,ग्रह और न्यास की जानकारी बहुत आवश्यक है।इन्ही के आधार पर स्वरों, श्रुतियों तथा संवाद सिद्धांत का ध्यान रखते हुए नए रागों का निर्माण संभव है।
राग निर्माण के लिए कुछ विशेष बातों को ध्यान में रखना चाहिए…..
1) थाट के स्वरों को ज्यों का त्यों रखते हुए,उनकी गति में परिवर्तन करना और विश्रांति के स्वरों को बदल देना,जैसे सोहनी,पुरिया और मरवा।
2) थाट लौटा जाए और विश्रांति स्वर भी बदले जाए,जैसे मालकौस और हिंडोल।
3) राग के स्वरूप और थाट को ज्यों का त्यों रखते हुए उसमें एक स्वर की वृद्धि कर दी जाए, जैसे राग पूरिया से मालीगौरा बनाने के लिए उसमें पंचम का समावेश किया गया है।
4) किसी राग का एक स्वर कम कर दिया जाए और उसकी गति को उन्मुख कर दिया जाए तब भी राग में भिन्नता आ जायेगी।
5) दो अलग अलग थाटो से एक जैसे स्वर समुदाय लेकर आरोह में एक थाट और अवरोह में दूसरा थाट रखकर नए राग की सृष्टि की जा सकती है।
6) दो अथवा अधिक रागों के मिश्रण से भी नए राग का निर्माण किया जा सकता है और ध्यान रखा जाता है कि निर्मित राग का व्यक्तित्व स्वतंत्र हो।
7) एक थाट के पूर्वार्ध और दूसरे थाट के उत्तरार्ध को लेकर नए राग को बनाया जा सकता है।जैसे शुद्ध पीलू जिसके पूर्वार्ध में भैरवी और उत्तरार्ध में भैरव थाट स्पष्ट दिखाई देता है।
शास्त्र किसी भी रुचिकर और संतुलित परिवर्तन का विरोध नहीं करता,किंतु अवश्यकता इसी बात की होती है कि मनुष्य को आनंदित करने वाले तत्व विश्रिंखल ना हो।
उपर्युक्त समस्त तथ्यों का ध्यान रखकर नए रागों का निर्माण किया जाना चाहिए।स्वर (राग),पद (भाषा), ताल (छंद) और गति (लय) का समन्वित रूप ही भावप्रधान गीत की संज्ञा से सुशोभित होता है।
स्वर रचना के सिद्धांत
भारतीय संगीत के रागों में जो रचनाएं निबध्द की जाति है,उसमे ध्रुपद धमार, ख्याल,तराना,टप्पा,ठुमरी,दादरा,सामान्य गीत,भाव गीत ग़ज़ल, कव्वाली, लोकगीत तथा फिल्मी गीत में किसके लिए बंदिश (composition) तैयार की जा रही है।इनमे से किसी के लिए जब भी कोई बंदिश बनाई जाती है तो उसके रचयिता देश,काल, स्थिति, पात्र,कंठ और शैली सभी का ध्यान रखते हैं,अन्यथा वो सफल नहीं हो पाएंगे।कभी कभी स्वर शब्दो को आमंत्रित करते हैं और कभी कभी शब्द अनुकूल स्वरों को प्रतिध्वनित करते हैं।कहने का मतलब कभी कभी ऐसा होता है कि कोई कविता सुनकर उसके अनुरूप धुन तुरंत ही तैयार हो जाती है और कभी कभी स्वर मन में गूंजते है इससे नई धुन बनती है और उस पे शब्दो को पीरो दिया जाता है।
स्वर रचना के सिद्धांत
भारतीय संगीत के रागों में जो रचनाएं निबध्द की जाति है,उसमे ध्रुपद धमार, ख्याल,तराना,टप्पा,ठुमरी,दादरा,सामान्य गीत,भाव गीत ग़ज़ल, कव्वाली, लोकगीत तथा फिल्मी गीत में किसके लिए बंदिश (composition) तैयार की जा रही है।इनमे से किसी के लिए जब भी कोई बंदिश बनाई जाती है तो उसके रचयिता देश,काल, स्थिति, पात्र,कंठ और शैली सभी का ध्यान रखते हैं,अन्यथा वो सफल नहीं हो पाएंगे।कभी कभी स्वर शब्दो को आमंत्रित करते हैं और कभी कभी शब्द अनुकूल स्वरों को प्रतिध्वनित करते हैं।कहने का मतलब कभी कभी ऐसा होता है कि कोई कविता सुनकर उसके अनुरूप धुन तुरंत ही तैयार हो जाती है और कभी कभी स्वर मन में गूंजते है इससे नई धुन बनती है और उस पे शब्दो को पीरो दिया जाता है।
स्वर रचना के लिए कुछ बातों पे ध्यान देना आवश्यक है……
अनुपात(Proportion).. राग या धुन में उसके स्वरूप को क्षति पहुंचने वाले स्वर संदर्भों का प्रयोग नहीं होना चाहिए। उन स्वरों का प्रयोग करना चाहिए जिनसे धुन सुंदर लगे। वादी संवादी स्वरों का ध्यान रखना चाहिए।ऐसे ही बंदिश(composition) के आलाप और तान के अनुपात का ध्यान रखना चाहिए, नहीं तो बंदिश का सौन्दर्य निखर के सामने नहीं आएगा।
संयोजन(symmetry)- सप्तक के पूर्वांग में वादी स्वर या प्रमुख स्वर हो तो उतरांग में संवादी स्वर होना चाहिए।पूर्वांग में दोनो गांधार लगते हो तो उतरांग में दोनो निषाद लगाए जा सकते हैं।पूर्वांग में ऋषभ दुर्बल हो तो उतरांग में निषाद दुर्बल रहना चाहिए।कोमल तथा तीव्र स्वरों में समता रहनी चाहिए ताकि राग और थाट का संबंध विच्छेद न हो।बंदिश की उठान या उसकी प्रकृति के अनुरूप ताल योजना होनी चाहिए।
संगति (harmony).. अनेक स्वर संगतियों के होने पर भी रचना की प्रकृति और स्वरूप को हानि नहीं पहुंचनी चाहिए।अलग अलग कलाकारो के द्वारा गाई जाने पर रागात्मक संगति,और विभिन्न रागों या लायकारियो का मिश्रण होने पर रचनात्मक संगति सुरक्षित रहना चाहिए नहीं तो रचना से प्रकट होने वाले भाव और रस को क्षति पहुंचती है।
संतुलन( balance).. तीनों सप्तको में विचरण करते समय संतुलन बनाए रखना चाहिए।कोई कोई कलाकार मद्र सप्तक और तार सप्तक में अटकते है और स्वयं की सुविधानुसार रचना का संतुलन खो देते हैं।इससे मूल रचना सौंदर्यविहीन लगने लगती है।इसी प्रकार आलाप तान लयकारी तिहाइयां आदि के संतुलन पर ध्यान रखना आवश्यक है।
विविधता(variety).. एक ही रचना को विभिन्न कलाकारो द्वारा प्रस्तुत किए जाने कंठगत,परंपरागत एवं कल्पनागत परंतु मर्यादित प्रयोगों के द्वारा उसमे नवीनता या विविधता की सृष्टि की जा सकती है।प्रस्तुतिकरण की विविधता ही रचना का नया जन्म है।
स्थायित्व(stability).. राग या स्वर रचना में एक स्थायित्व होता है जिसके कारण उसमे परिवर्तन करना सहज संभव नहीं होता है।इस स्थायित्व के कारण काल ,प्रस्तुति , माध्यम अथवा शैलीगत विभिन्नता का उसपे कोई प्रभाव नहीं पड़ता और वो अमर बनी रहती है।
जटिलता(intricacy).. सरलता हृदय को छूती है तो जटिलता मस्तिष्क को संतुष्ट करती है।रचना की विचित्रता जटिलता पर आधारित होती है।जटिलता का संतुलित प्रयोग कलात्मक क्षमता का परिचायक है।
भावात्मक महत्व(emotional value).. रचना में उपयुक्त स्वर,स्वरों के उपयुक्त शब्द और शब्दो के उपयुक्त ताल लय का समायोजन होना चाहिए तभी श्रोता को आनंद आएगा।भाव और रस निष्पत्ति किसी राग या स्वर रचना का मूल अभिप्राय या धर्म है,इसीलिए भावात्मक स्वर रचना का प्राण कहलाता है।
संगीत का प्रयोजन रस परिपाक है और यही उसका लक्ष्य है।इसीलिए कहा है..रंजयती इति राग: अर्थात् जो चित्त का रंजन करे, वही राग है।जिस प्रकार राग रचना में राग के धर्मो का पालन करना चाहिए।उसी प्रकार संगीत रचना में रंजक तत्वों के प्रयोग का ध्यान रखना चाहिए और गीत रचना में गीत के शब्द,छंद,लय,उपमा अलंकार,प्रारंभ एवं अंत,स्वर एवं भाव के साथ उसके सामंजस्य,प्रकृतिगत विशेषताएं तथा मौलिकता का ध्यान रखना चाहिए।


