यह भारत की ही धरती है जिसमें कई राजा, महाराजा, ऐसे हुए जो वीर, पराक्रमी होने के साथ ही साथ संगीत – कला प्रेमी और सांगितज्ञ भी रहे हैँ। इन्ही में एक थे ग्वालियर के राजा मानसिंह तोमर। मानसिंह अपने पूर्वजों की तरह शूर, साहसी होने के साथ -साथ साहित्य, संगीत एवं कला पोषक तथा आश्रय दाता भी रहे। मानसिंह संगीत प्रेमी ही नहीं उच्च कोटि के संगीत ज्ञाता भी थे। इनका शासन काल सन 1486 से 1458 तक रहा।
कार्य – कई अच्छे – अच्छे गायक – वादक मानसिंह के दरबार की शोभा बढ़ा रहे थे। इनमे बैजू,छरजू भगवान, धोंडू बख्श तथा रामदास प्रसिद्ध है। मानसिंह का नाम मुख्य रूप से ध्रुपद गीत शैली के कारण है। उन्होंने अपने आश्रित कलाकारों से आग्रह किया कि वे एक नवीन गान शैली की रचना करें जो मनोरंजन व आकर्षक हो किन्तु संक्षिप्त ही हो। सभी के सहयोग, विशेषकर बैजू की सूझ तथा प्रयत्न से ध्रुपद गीत का प्रदुर्भाव हुआ।इसके लिए उन्होंने बैजू कों नायक की उपाधि से विभुषित किया। मानसिंह द्वारा सम्पादित यह कार्य बहुत बड़ा था इसमें कोई संदेह नहीं। उनके पश्चात अकबर के समय भी यह गीत खूब फला फूला।आज भी इसे सम्माननीय मना जाता है।
राजा मान सिंह ने एक और उल्लेखनीय कार्य किया, वह था मानकौतुहल ग्रन्थ की रचना। इस ग्रन्थ में स्वयं मानसिंह द्वारा रचित कुछ ध्रुपद तो हैँ ही, संगीत शास्त्र का पर्याप्त विवेचन है। इतना ही नहीं, उसमे उस सम्मलेन का भी विवरण है जो मानसिंह के निर्देशन में हुआ था। इस सम्मलेन में बड़े -बड़े गुणी संगीतग्यो ने भाग लिया। इस ग्रन्थ का फ़क़ीरुल्ला नामक विद्वान ने फ़ारसी में अनुवाद किया था, जो राग दर्पण नाम से प्रसिद्ध है।
राजा मानसिंह की एक रानी का नाम मृगनयनी था। जो गुजरी (गुर्जर ) थी। इस रानी के नाम पे ही नायक बैजू ने गुजरी तोड़ी नामक नये राग की रचना की।इस प्रकार मानसिंह के राज्य काल में नवीन गीत शैली एवं नवीन राग का प्रादुर्भाव हुआ, संगीत शास्त्र का विवेचन हुआ, संगीत सम्मलेन के आयोजन का शुभारम्भ हुआ। इसी कारण संगीत क्षेत्र में मानसिंह विख्यात एवं स्मरणीय हैँ।


