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सरल एवं शास्त्रीय संगीत की तुलना

शास्त्रीय संगीत के अंतर्गत प्राचीन काल में जाति,प्रबंध,रूपक आदि गाए जाते थे।इनके बाद ध्रुपद गायन का प्रचलन हुआ,पर आज ख्याल गायन का प्रचार है।

शास्त्रीय संगीत के सरलीकरण की दृष्टि से ठुमरी,टप्पा,दादरा, ग़ज़ल,भजन गायन शैलियों को वर्तमान में अर्धशास्त्रीय,उपशास्त्रीय संगीत की संज्ञा दी जाती है।ये चीजें राग रागिनियों में निबद्ध होते हुए भी कुछ अंशों मे सरल संगीत का आनंद देती हैं।आजकल फिल्मी गीतों को भी लोग सरल संगीत कहने लगे हैं।सरल संगीत उसे कह सकते हैं, जिसे सुनकर संगीत कला से अनभिज्ञ श्रोता भी आनंदमग्न हो जाए।सरल संगीत की परिधि में ऐसी प्रत्येक धुन चाहे वो कंठ के द्वारा निकली हो या कोई वाद्य से निकली हो,सुनकर सभी आनंदित हो उठे।

शास्त्रीय संगीत से केवल वो लोग ही आनंदित हो सकते हैं,जिन्होंने आंशिक ही सही– शिक्षा प्राप्त की हो।बसंत बहार, तोड़ी और हमीर जैसे रागों की गहराई का आनन्द वही व्यक्ति ले सकता है,जिसने संगीत की शिक्षा ली हो।इसी प्रकार तबला,सितार,वायलिन,सरोद,वीणा आदि के वादन का आनंद वो हो ले सकते हैं जिन्हे स्वर की बारीकियों,उतार चढ़ाव मींड मुर्की,जमजमा, क्रंतन, सूत,घसीट आदि का ज्ञान हो।इसके विपरित कहरवा की लग्गी लड़ी एवं गायन या वादन द्वारा प्रस्तुत कोई भी सरल धुन सुनकर साधारण श्रोता भी संगीत का आनंद ले सकते हैं।

शास्त्रीय एवं सरल संगीत दोनो अपने अपने जगह पर प्रभावशाली हैं।अंतर केवल इतना ही है कि शास्त्रीय संगीत अधिकांशतः उन्हीं लोगों को प्रभावित करने में सक्षम है,जिन्हे संगीत व्याकरण– सुर,ताल,लय आदि का भली – भांति ज्ञान होता है।परन्तु सुगम संगीत यदि किसी मधुर सुरावली में प्रस्तुत किया जा रहा है,चाहे वो स्वर किसी कंठ या वाद्य से निकले हो,तो भी वह सभी प्रकार के श्रोताओं को आनंद प्रदान करने में सक्षम होता है।यदि शास्त्रीय संगीत मस्तिष्क है तो सरल संगीत हृदय है।दोनो अपने अपने श्रोताओं को रिझाने में समर्थ होते हैं।

bhartadm

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