स्वामी हरिदास का जन्म भाद्र पक्ष शुल्क अष्टमी,संवत 1537 ( सन 1490)
में,उत्तर प्रदेश के अलीगढ़ जिले में,खैरवाली सड़क पर एक छोटे से गांव में हुआ था।इसी कारण उस गांव का नाम भी हरिदासपुर होगया।आपके पिता का ना श्री आशुधीर था,जो कि मुल्तान जिले के उच्च ग्राम निवासी थे।आप सारस्वत ब्राह्मण कुल के प्रतिष्ठित व्यक्ति थे।हरिदास जी की माता का नाम गंगा था।
बाल्यकाल से ही संगीत के संस्कार स्वाभाविक रूप से आपके अंदर विद्यमान थे।25 वर्ष की तरुण अवस्था में आप वृंदावन आ गए और निधिवन निकुंज की एक झोपड़ी में निवास करने लगे।यहां पर एक मिट्टी का बर्तन और गुदड़ी,यही स्वामी जी की संपत्ति थी।
ब्रज के कण कण में यमुना के नीर में,गगन मंडल के चांद तारों में आप भगवान कृष्ण की लीलाओं की मनोरम झांकियां करने लगे।चारों ओर से गुंजित होने वाले मुरली के मधुर नाद ने स्वामी जी को आत्मविभोर कर दिया।
वृंदावन में निवास करके स्वामी जी ने ब्रज भाषा में अनेक ध्रुपद गीतों की रचना की तथा उन्हें शास्त्रोक्त राग व तालों में गाकर जिज्ञासुओं को तृप्त किया।
यों तो स्वामी जी के संगीत प्रसाद अनेक व्यक्तियों को मिला होगा,किंतु इनके मुख्य शिष्यों के नाम ‘नादविनोद ‘ नामक ग्रंथ में इस प्रकार पाए जाते हैं –
बैजू, गोपालदास,मदनराय ,रामदास ,दिवाकर पंडित,सोमनाथ पंडित,तन्ना मिश्र ( तानसेन) , और राजा सौरसेन।
दक्षिण छोडकर समस्त देश में वर्तमान प्रचलित शास्त्रीय संगीत स्वामी जी व उनके शिष्यों की ही विभूति है।संगीत कल्प द्रुम में बहुत सी रचनाएं स्वामी जी की ही रची हुई प्रतीत होती हैं।आजकल ब्रज में जो रास लीला प्रचलित है,उसको स्वामी जी की देन समझना चाहिए।रास के पदों की गायन युक्त परिपाटी के प्रवर्तक आप ही थे,जो आजतक लोकप्रिय होकर धार्मिक भावनाओं को कलात्मक रूप दे रही है।
स्वामी हरिदास जी के संगीत को सुनने के लिए बड़े बड़े राजा महाराजा उनके द्वार पर खड़े रहते थे।एक बार अकबर ने भी तानसेन जी के साथ आकर गुप्त रूप से स्वामी जी का गायन सुना था।
अंत में संवत 1632(सन 1575) में,95 वर्ष की आयु में आप इस भौतिक शरीर को त्यागकर सदैव के लिए निधिवन के कुंजो में विलीन हो गए।


