गाथा गान
गीत के माध्यम से किसी कथा को कहना,”गाथा गान” कहलाता है।
गाथा शब्द का सबसे पहले प्रयोग ऋग्वेद में हुआ है। उस समय यज्ञ के अवसर पर गाथा गाने की प्रथा थी। श्लोकबद्ध रचना ही गाथा कहलाती है। प्राकृत भाषा में लिखी गई वर्तमान समय की गाथा सप्तशती एक सुप्रसिद्ध रचना है, जिसको सभी जानते हैं।
“लोकगाथा” और “लोकगीत”के स्वरूप और विषय में अंतर होता है।जैसे प्रेम,वीर, रहस्य रोमांचक कथाओं को कहने का अंतर।लोक गाथाओं के संगीत को बार बार गाया जाता है, जिससे उनका रस समाप्त न हो।”गाथागान” एक पद्य का प्रकार होता है किंतु उसमे साहित्यिक अलंकार और उपदेशात्मक प्रवृत्ति नहीं होती है।कथानक (छोटी कविता)की जैसी भावना होती है उसी प्रकार गाथा के संगीत को एक व्यक्ति गाता है और बाकी समाज या अन्य व्यक्ति उसका अनुसरण करते हैं।गाथा के दृश्य को हरेक पंक्ति के द्वारा ऐसे प्रस्तुत किया जाता है कि व्यक्ति को ये अनुभूति होने लगती है कि वह एक चलचित्र(फिल्म) देख रहा हो।गाथा गान को ग्राम गीत,नृत्य गीत,वीर काव्य के नाम से भी जाना जाता है।अंग्रेजी “बैलेड” के लिए लोक साहित्य में अब गाथा शब्द का प्रयोग होने लगा है। “बैलेड” उस काव्य रूप का नाम है जिसमे सीधे छंदों में कोई सरल काव्य कही गई हो।संगीत के क्षेत्र में जब “बैलेड”शब्द का प्रयोग होता है तो उसे एक वाद्य सहित या संवेग रूप में नृत्य के साथ गाए जाने वाले माध्यम के रूप में जानना चाहिए।
संक्षेप में “गाथागान” को ऐसा लोक गीत कह सकते है,जो परंपरागत रूप में समाज को इतिहास का ज्ञान कराने के लिए व्यक्ति के गायन के रूप में सुरक्षित है।
नृत्य गीत
गायन की तरह नृत्य का भी काव्य से घनिष्ठ संबंध है।जिस तरह गाथा गान में गाथा की प्रधानता होती है संगीत सहायक होता है उसी तरह “नृत्य गीत”में नृत्य की प्रधानता होती है काव्य या गीत सहायक होते हैं।सामूहिक “नृत्य गीत”से ही नृत्य,संगीत और छंद का विकास हुआ।जैसे-जैसे व्यक्ति की चेतना विकसित हुई वैसे-वैसे शब्दो में भी बदलाव आया।इस प्रकार एक ही गीत में एक तरह की भावना,प्रार्थना,किसी घटना का वर्णन किया जाने लगा।बाद में ये भावना परक गीत ही गीति (lyric), प्रार्थना परक गीत( स्तोत्र हिम) और कथा संबंधी आख्यान गीत (बैलेड) के रूप में विकसित हुए।लेकिन विकास की पूर्ण अवस्था में ये काव्य रूप सामूहिक नृत्य गीत से पूर्णतः स्वतंत्र हो गए,हालांकि नृत्य या गान से उनका संबंध किसी न किसी रूप में बना रहा और आज भी बना हुआ है।
अंग्रेजी के “बैलेड”नामक काव्य रूप और “बैलेड” शब्द का विकास “बेलारे” (समवेत नृत्य गीत) से हुआ है।यूरोप के कुछ देशों में नृत्य गीत को”कैरोल” और “बेलारे”कहा जाता था।उसी से “बैले”(एक नृत्य प्रकार) शब्द प्रचार में आया।भारत के अनेक प्रदेशों में नृत्य गीतों का प्रचार है।जैसे जौनपुर में “चौरसिया नृत्य”,मिर्जापुर में “करमा नृत्य”।
गीति काव्य
कवि के व्यक्तिगत भाव और अनुभूति को लयात्मक अभिव्यक्ति देने के विधान को “गीति काव्य”कहते हैं।जिसमे गीतकार की दृष्टि अत्यंत वैयक्तिक,सीमित और आत्मनिष्ठ होती है।संस्कृत में “गीतगोविंद” जैसे गिती काव्य ( प्रबंध गान) और “विद्यापति”की हिंदी पदावली में गीति काव्य को स्वतंत्र परंपरा प्राप्त हुई है,जिनमे शब्द और स्वर अपने-अपने क्षेत्रों में व्यापक प्रभाव लिए हुए हैं।गेयकाव्य(गाने वाले) को हो “गीतिकाव्य” कहते हैं जिसका विकास आधुनिक काल में सबसे अधिक हुआ है।इसमें गीत की प्रधानता रहती है और संगीत सहायक रहता है।अंग्रेजी में इसे lyric कहते हैं।वैष्णव भक्त कवियों के “कृष्ण काव्य” और “राम काव्य”में गीतिकाव्य का सबसे उत्कृष्ट नैसर्गिक रूप प्राप्त होता है।


