मोटे तौर पर शास्त्रीय संगीत उसे कहते हैं,जो शास्त्र की नियमानुसार प्रस्तुत किया जाय।लोक संगीत उसे कहा जा सकता है,जिसे कोई भी व्यक्ति उन्मुक्त रूप से गुनगुना उठे।दोनो में केवल इतना ही अंतर है कि शास्त्रीय संगीत ने विभिन्न राग रागिनियो की सुसज्जित पोशाक पहन रखी है एवं लोक संगीत केवल ध्वनि और लय के आंचल में बंधे हुए मस्ती भरे अंदाज में उन्मुक्त भ्रमण कर रहा है,किंतु वास्तव में संगीत की इन दोनो विधाओं के महल ध्वनि और लय के आधार पर ही खड़े हैं।
आज का तथाकथित शास्त्रीय संगीत स्वामी हरिदास,तानसेन,बैजूबावरा आदि महान संगीतकारों की विरासत है,तो भारत के विभिन्न प्रांतों के ग्रामीण अंचलों में फैला हुआ लोकसंगीत मानवीय उल्लास की चटक चांदनी है।शास्त्रीय संगीत घरानों की शक्ले लेकर विश्रिंखल हो गया है,किंतु लोक संगीत आज भी सामूहिक रूप में अपने अपने चौपालों, खेत खलियानों और गली गलियारों में विद्यमान है।शास्त्रीय संगीत को मार्ग संगीत और लोक संगीत को देशी संगीत कह सकते हैं।
संगीत के अनेक मूर्धन्य शास्त्रकारों के मतानुसार लोक संगीत,शास्त्रीय संगीत का बीज रूप है।किसी भी कला अथवा विद्या के शास्त्र का सृजन तभी संभव होता है,जब वह अस्तित्व में आकर विकसित हो।यही बात संगीत पर भी पूर्णरूपेण लागू होती है।
निष्कर्ष के रूप में इतना कहा जा सकता है कि शास्त्रीय संगीत मनुष्य द्वारा निर्मित सिद्धांतो की बंदिश में रहता है जबकि लोक संगीत का निर्माण प्रकृति की प्रेरणा से या मानव हृदय से निकले सुख और दुख के भावों से होता है।शास्त्रीय संगीत (गायन वादन नृत्य) शास्त्र पर आधारित है लेकिन लोक संगीत सामाजिक परम्पराओं से जुड़ा हुआ है।


