शारंग देव का समय 1210 से 1247 ईo के मध्य का माना जाता है।ये देवगिरि (दौलताबाद) के यादव वंशीय राजा के दरबारी संगीतज्ञ थे।
13 वीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में पंडित शारंग देव ने ‘ संगीत रत्नाकर ‘ग्रंथ की रचना की।इसमें नाद,श्रुति,स्वर,ग्राम, मुर्छना, जाति इत्यादि का विवेचन भली प्रकार किया गया है। दक्षिणी और उत्तरी संगीत विद्वान इस ग्रंथ को संगीत का आधार ग्रंथ मानते हैं।शरंगदेव ने अपनें इस ग्रंथ में मतंग से अधिक विवरण अवश्य दिया है किंतु सैद्धांतिक दृष्टि से मत लगभग एक समान है।इसमें गायन वादन नृत्य तीनों का विवरण है।
प्रथम अध्याय में नाद का स्वरूप,नादोत्पत्ति और उसके भेद, सरणा चतुष्टय,ग्राम,मूर्छना,तान निरूपण,स्वर और जाति साधारण,वर्ण अलंकार और जातियों का विस्तृत वर्णन किया गया है।
द्वितीय अध्याय में ग्राम राग व उनके विभाग तथा रागांग, भाषांग शब्दों का स्पष्टीकरण और देशी राग व उनके नाम आदि।
तृतीय अध्याय में वाग्गेयकार के लक्षण,गीत के गुण दोष ,गायक के गुण दोष और स्थाई इत्यादि।
चतुर्थ अध्याय में गान के निबध्द और अनिबद्ध भेद,धातु व प्रबंध के भेद तथा अंगों इत्यादि का विवरण प्राप्त होता है।
पंचम अध्याय में ताल विषय इत्यादि।
छठे अध्याय में तत्, सुशीर,अवनध और घन वाद्यों के भेद वादन विधि तथा वाद्यों और वादको के गुण दोष दिए गए हैं।
सप्तम अध्याय नृत्य , नाट्य और नृत्त पर है।इसमें नर्तन संबंधी प्रत्येक बात को स्पष्ट किया गया है।
इस ग्रंथ में कुल 264 रागों का वर्णन किया गया है। इन रागों का वर्गीकरण राग, उपराग आदि के आधार पर किया गया है। वर्गीकरण इस प्रकार है —
ग्राम राग – 30
राग – 20
पूर्व प्रसिद्ध भाषांग राग — 11
पूर्व प्रसिद्ध उपांग राग – 03
पूर्व प्रसिद्ध भाषा राग – 96
अंतरभाषा राग – 04
उनके काल में प्रचलित क्रियांग राग – 03
उनके काल में प्रचलित उपांग राग – 27
उपराग -08
पूर्व प्रसिद्ध रागांग राग – 08
अधुना प्रसिद्ध रागंग राग – 12
पूर्व प्रसिद्ध विभाषा राग – 20
उनके काल में प्रचलित राग – 01
उनके काल में प्रचलित भाषांग राग – 09
शारंग देव ने यद्यपि अपने ग्रंथ की नीव भरत के ‘ नाट्यशास्त्र ‘ तथा मतंग के ‘ वृहद्देशी ‘ पर रखने की चेष्टा की है,किंतु यह स्पष्ट है कि इनके समय में भरत की जातियां नष्ट हो चुकी थी तथा मतंग के काल के देशी रागों के स्थान पर अनेक नए रागों ने स्थान ले लिया था,
‘ जिन्हे अधुना प्रसिद्ध राग ‘ कहा जाता था।इसलिए शारंग देव को अधुना प्रसिद्ध रागों के विषय में ही कुछ कहना आवश्यक था।परंतु उन्हें अपने रागों का क्रम पीछे के सिद्धांतो से भी जोड़ना था, इसलिए उन्होंने अपने रागों का संबंध पुराने रागों से और पुराने रागों का संबंध जातियों से जोड़ने का प्रयत्न किया है।किंतु जातियों का बिलकुल लोप हो जाने के कारण यह संबंध सुचारू रूप से न जुड़ सका।फलस्वरूप यह ग्रंथ संगीतज्ञों के लिए कुछ दुर्बोध सा हो गया।इस प्रकार यद्यपि शांरंगदेव ने श्रुति, स्वर, ग्राम,जाति आदि के वर्णन में भरत का अनुकरण किया है,फिर भी उनकी पद्धति में प्रगति और विकास के लक्षणों का अभाव नही है।मूर्छनाओ की मध्य सप्तक में स्थापना ,विकृत स्वरों की कल्पना , मध्यम ग्राम का लोप और प्रति मध्यम की उत्पत्ति इत्यादि विषय ‘ संगीत रत्नाकर ‘ की मौलिकता की प्रकट करते हैं।


