पंडित व्यंकटमखी का पूर्ण नाम व्यंकटेश था। व्यंकटमखी दक्षिण भारत के निवासी थे तथा दक्षिण भारत के संगीत के विद्वान् थे। आपके पिता का नाम श्री गोविंद दीक्षित था। आपकी माता का नाम नागमम्बा था। इनका जन्म सम्भवतः तंजावर नामक स्थान में हुआ था। इनके पिता नायक वंश के अंतिम राजा विजयराघव के दिवान थे। विजयराघव कला प्रेमी राजा थे, उन्होंने व्यंकटमखी कों अपने यहाँ दरबारी गायक के रूप में स्थान दिया। स्पष्ट है कि उस समय तक गायन में इनकी ख्याति होगयी थी। इनके गुरु का नाम तान्नप्पाचार्य था।
कार्य : – पंडीत व्यंकट मखी अपने मेल विवेचन के लिए उत्तर भारतीय संगीतगयों में प्रसिद्ध हैँ। आज के थाट नामक वस्तु पहले मेल कहलाती थी। पंडित जी ने मेल और मेल पद्धती का विशेष रूप से विवेचन किया है। उन्होंने बारी बारी से सभी स्वरों से युक्त बनने वाली मेलों कि अधिकतम संख्या का निर्णय किया। उन्होंने सिद्ध कर दिया कि गणित कि दृष्टि से मेलों की अधिकतम संख्या 72 ही संभव है, इससे अधिक नहीं। स्मरण रहे उन्होंने गणित द्वारा केवल अधिकतम संख्या ही स्पष्ट की है, वैसे उनकी स्वयं दी हुई सीमाओं के अनुसार यह संख्या 32 ही रह जाती है। राग विवेचन में उन्होंने 19 मेलकर्ता अथवा मेलों का ही प्रयोग किया है। मेल की संख्या 72 से अधिक नहीं हो सकती, इसका उन्हें इतना दृढ विश्वाश था कि उन्होंने घोषणा कर दी कि “यदि स्वयं शंकर भगवान आ जाएँ तो भी वे इससे अधिक संख्या नहीं बना सकते।”चतुरदंड प्रकाशिका नामक उनका रचित ग्रंथ है। संगीत के चारो अंगो का इसमें वर्णन होने के कारण उन्होंने इसका नाम (चतु =4,दंडी =अंग + प्रकाशिका ) चतुरदंड प्रकाशिका रखा। उन्होंने गुरु चरणों में एक नवीन राग रचना आरभी अर्पण की। इस राग में उन्होंने गुरु गुणगान में एक गीत गंधर्व जलता खर्व की रचना की।
इस प्रकार नवीन राग की रचना, मेल या थाट के संबंध में एक नवीन दृष्टिकोण तथा चतुरदण्ड प्रकाशिका ग्रन्थ की रचना ऐसे कार्य हैँ जो इन्हे एक उच्च स्थान प्रदान करते हैँ। सभी सांगितग्यो के लिए वह वंध्य हैँ। ऐसा माना जाता है की सतरहवीं शताब्दी में इस विद्वान् की मृत्यु हो गयी।


