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ध्रुपद

उत्तर भारत का मध्यकालीन गीत जिसमें गंभीरता तथा भाषा की प्रौढ़ता होती है, ध्रुपद शब्द का शुद्ध रूप धृवपद है।

कुछ विद्वानो के अनुसार यह प्राचीन धृवा गीति है, कुछ के अनुसार यह प्राचीन प्रबंधो का संक्षिप्त रूप है किन्तु आजकल प्रायः सभी विद्वानो का मत है कि धृपद का अविष्कार ग्वालियर के राजा मानसिंह तोमर द्वारा किया गया।

आचार्य वृहस्पति द्वारा लिखित संगीत चिंतामणि ग्रन्थ के पृष्ठ 51-52 के अनुसार ” मानसिंह ने प्रसिद्ध ध्रुपद पद्धति कों जन्म दिया। उनके दरबारी गायक बख्शू ने इसका प्रचार और प्रसार किया। यह गान पद्धति जनता के प्रत्येक वर्ग के लिए रुचिकार हुई। इस समय से लेकर औरंगजेब के समय तक इस गीति का ही बोलबाला रहा। ” इस काल में बैजू, बख्शू, चिंतामणि मिश्र तथा श्रेष्ठ कलाकार तानसेन धृपद गायक ही थे जिन्होंने बहुसंख्य धृपद की रचना की।

ध्रुपद एक शब्दप्रधान गीत होता है। इसकी भाषा उच्च तथा भावयुक्त होती है तथा इसकी कविता बड़ी तथा साहित्यिक होती है। धृपदो की रचना संस्कृत भाषा अथवा मध्यदेशीय हिंदी में की गयी थी। आजकल हिंदी और बृज भाषा में धृपद अधिक मात्र में हैँ, वैसे अवधि व खड़ी बोली आदि विभिन्न भाषाओं में भी धृपद मिलते हैँ। इसमें वीर, श्रृंगार, शांत इत्यादि रसों की प्रधानता रहती है। अर्थपूर्ण कविता, उचित रस, शब्द, स्वर तथा ताल की शुद्धत्ता के कारण धृपद गीत उच्च स्तर का गीत मना जाता है।

ध्रुपद में स्थाई, अंतरा, संचारी, अभोग, ये चारों भाग होते हैँ। प्रत्येक भाग में चार -चार अथवा तीन -तीन पंक्तियाँ होती थीं, जिनमे अंत्यानुप्रास तथा चार चरण भी होते थे। आजकल ध्रुपद में स्थाई तथा अंतरा दो ही भाग दिखाई देते हैँ और यही गाये जाते हैँ। “आदनाद ब्राम्हनाद “तानसेन द्वारा रचित ध्रुपद माना जाता है। मालकौस का ‘राजन के राजा महाराजा ‘, केदार राग का ‘बूँद पवन’, वृन्दावन सारंग का ‘दहन लगो चंद्रकिरण ‘ये सब प्रसिद्ध ध्रुपद हैँ
ध्रुपद गीत की गायन शैली मधुर या कोमल ना होकर गंभीर होती है। इसके गाने में पर्याप्त शक्ति की आवश्यकता होती है। ध्रुपद गाने से फेफड़ों पर बहुत जोर पड़ता है इसलिए इसको “मर्दाना गीत “भी कहते हैँ।वास्तव में गायन की यह शैली पुरुष कंठ की लिए ही उपयुक्त है।

ध्रुपद किसी भी राग में हो सकता है किन्तु प्रचार में गंभीर रागों में ध्रुड अधिक मिलते हैँ । ध्रुपद गीत चरताल, शूलताल, तीव्रा आदि तालो में गए जाते हैँ। ब्रम्ह, मत्त, रूद्र आदि में भी ध्रुपद होते हैँ किन्तु चार ताल के ध्रुपद अधिक प्रचलित हैँ। ये सभी ताल पखावज या मृदंग के ताल हैँ किन्तु मृढंग का प्रचार कम होने से तबले पर ही खुले बोलो द्वारा यह ताल बजाकर ध्रुपद के साथ संगत की जाती है। यह गीत विलंबित लय में ही गया जाता है।

ध्रुपद गाने से पूर्व उसी राग का अलाप लिया जाता है। यह अलाप विस्तृत होता है तथा इसे भी स्थाई, अंतरा, संचारी, आभोग,इसने चार भागों में बाँट लेते हैँ। अलाप नोम तोम में होता है। गमक आदि लेते हुए क्रमशः लय बढ़ाते चलते हैँ। इस अलाप के बाद गीत का स्थाई अंतरा गया जाता है। ध्रुपद गाते समय उसकी बंदिश या रचना में कोई अंतर नहीं होने देते। गाते समय स्वर, राग तथा शब्द की पुर्ण शुद्धता रखी जाती है। इसके पश्चात् गायक दुगुन, तिगुण, चौगुण इत्यादि विभिन्न प्रकार की लयकारियां दिखाता है।इन्ही लायकरियों में विभिन्न प्रकार की तिहाइयाँ भी ली जाती हैँ। ध्रुपद गीत में अलाप, तान आदि अलंकारिक क्रियाएँ नहीं होती।

ध्रुपद गायको कों कलावंत कहा जाता था तथा उनका बहुत आदर होता था। कलावंत का अर्थ कला का ज्ञाता अथवा कलाकार है। कलावंतो की विभिन्न वानियां थी। जो खण्डार, नोहार, डागुर, तथा गोबरहार, नामो से पहचानी जाती थी। पंडित भातखण्डेय जी का कहना है, इन वानियों का उदगम कहाँ से हुआ होगा, निश्चित नहीं किया जा सकता है। तथापि अनेक विद्वानो के मत से प्राचीनकाल की शुद्धा, भिन्ना, बेसरा, गौड़ी, एवं साधारणी गीतियों से अर्थार्त गाने के विभिन्न रीतियों से इनका उदगम हुआ होगा।

ये वानिया उरोक्त घरानो की गायन शैलीयाँ थी, ऐसा भी माना जाता है। पिछले दो – ढाई सौ वर्षों में ध्रुपद गायन का प्रचार कम हो गया है, तथा इसका स्थान ख्याल नामक गीत ने ले लिया है। फिर भी इस गीत प्रकार का सम्मान कम नहीं हुआ है।

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