होली उत्सव से संबंधित धमार ताल में ध्रुपद के समान ही गाया जाने वाला गीत धमार अथवा होरी कहलाता है।
इस गीत का धमार नाम प्रसिद्ध है। कुछ लोग इसे धम्मार कहकर भी पुकारते हैँ। श्रीयुत महेश नारायण सक्सेना ( लेखक संगीत शास्त्र भाग 1 )भी हैँ, इस गीत कों ‘होरी’ कहकर पुकारते हैँ। कुछ पुराने गायक भी इसे होरी नाम से पुकारते हैँ। प्रचार में इसे धमार ही कहा जाता है और विद्यार्थियों के लिए यही उचित है, जिससे ‘होरी ‘ या ‘ होली गीत ‘ के र और ल के नामों में उन्हें भ्रम ना हो जाये।
कुछ विद्वान् का मत है कि ग्वालियर के राजा मानसिंह के दरबारी गायक बैजू बावरा ने इसकी रचना की। डॉ. वृन्दावन लाल वर्मा ने ‘मृगनयनी ‘उपन्यास में इसी मत का प्रतिपादन किया है। राजा मान सिंह ने इच्छा प्रकट की कि एक ऐसे गीत का अविष्कार किया जाय जो ध्रुपद से कम गंभीर हो , संक्षिप्त हो तथा श्रृंगार रस और चंचलता से युक्त हो। अतः बैजू जी द्वारा धमार का अविष्कार किया गया। राजा ने प्रसन्न होकर बैजू कों ‘नायक ‘ की उपाधि प्रदान की। कमोद राग की धमार ‘ राजा मान होरी खेले’प्रथम धमार मानी जाती है।
धमार गीत बृज भाषा में अधिक होते हैँ। कुछ गीत साधारण हिंदी में भी होते हैं। उर्दू तथा अन्य भाषाओ में धमार दिखाई नहीं देते। इनकी पद्ध रचना संक्षिप्त होती हैं। गीत में स्थाई अंतरा दो ही भाग होते हैँ। इनमे होली उत्सव का वर्णन होता हैं।श्री कृष्ण, राधिका तथा गोपियों द्वारा होली खेलने का वर्णन कई गीतों मिलता हैं। स्वाभाविक रूप से ही इस गीत प्रकार में होली खेलना, पिकरी, रंग, ग़ुलाल, अबीरआदि शब्दों की अधिकता रहती हैं।
धमार सभी गंभीर रागों में गाई जाती हैं।खमाज, तिलक कामोद, पीलू इत्यादि रागों में धमार नहीं होती। यह गीत सिर्फ धमार ताल में ही निबद्ध रहता हैं। धमार ताल 14 मात्रा की होती हैं। यह मृदंग की ताल हैं तथा आजकल भी मृदंग या पखावज के अभाव में यह तबले पर खुले बोलों द्वारा बजायी जाती हैं।
धमार की गायकी ध्रुपद के ही समान होती हैं। इसमें भी आलाप तथा तान नहीं लेते। गीत प्रारम्भ करने से पहले नोम तोम का आलाप कर लिया जाता हैं। स्थाई तथा अंतरा गाकर उसमें दुगुन तिगुन इत्यादि विभिन्न प्रकार की लायकारियां दिखाई जाती हैं। गाने में पर्याप्त शक्ति की अवश्यकता होती है। गायक का स्वर पुष्ट, घोर – युक्त तथा जोरदार हो तभी धमार अच्छी लगती है। धमार गीत ध्रुपद से कम गंभीर तथा अन्य गीत शैलियो से अधिक गंभीर होता हैं। बृन्दावनी सारंग राग की एक धमार इस प्रकार है —
बृज में धूम मची है, मोहन कृष्ण मुरारी गावत होरी तारी दे दे।
एक गावत एक मृदंग बजावत मुख मिंडत एक गोरी।


