मृदंग अथवा तबले के बोलो कों किसी भी राग में तथा ताल मरण बाँध कर गाया जाने वाला गीत त्रिवट अथवा तिरवट कहलाता है।
एक विद्वान् लेखक के मत से ” गीत के जिस प्रकार में, तीन चीज़ो — गीत के शब्द, तबले अथवा पखावज के बोल तथा सरगम का मिश्रण हो, वाह त्रिवट कहलाता हैं। ” अन्य किसी लेखक ने इस प्रकार की परिभाषा नहीं दी हैं। प्रचार में त्रिवट की इस प्रकार की कोई रचना दिखाई नहीं देती, अतः उपरोक्त प्रथम परिभाषा ही अचूक तथा युक्तियुक्त प्रतीत होती हैं।
इसका अविष्कार कब और कैसे हुआ, यह ठीक ठीक तो नहीं कहा जा सकता, कुछ अनुमान अवश्य लगाया जा सकता है — (1)- कुछ समय पूर्व तक गायन में प्रायः गायक और तबला वादक की लड़ंत तथा दाव पेंच अवश्य होते रहते थे। एक दूसरे को किसी प्रकार नीचा दिखा कर स्वयं कों श्रेष्ठ कलाकार सिद्ध करने का प्रयत्न किया जाता था। इसी संदर्भ में एक गायक का अविष्कार त्रिवट है। (2)- विविधता, वैचिंतय, नविनता या चमत्कार से युक्त गीतों की नवीन रचना प्रस्तुत करने की प्रवृत्ति सदैव से रही है। चतुरंग, सरगम, तराना, धमार, तथा यह त्रिवट भी इसी प्रवृत्ति का परिणाम है।
त्रिवट की रचना छोटे ख्याल के समान न बहुत संक्षिप्त होती है, न बहित बड़ी। इसमें स्थाई और अंतरा दो भाग होते हैँ। गीत में केवल मृढंग के बोलो का ही समावेश होता है। त्रिवट सभी रागों में होता है। यह एकताल, झप ताल तथा तीन ताल आदि तालो में निबद्ध होते हैँ।
त्रिवट तराने के समान ही गाया जाता है, इसमें भी अलाप नहीं होते। ताने भी केवल कुछ लोग ही गाते हैँ, वह भी थोड़ी ही। लय द्रुत रहती है इसमें दुगुन तिगुन चौगुन नहीं ली जाती। प्रचार में त्रिवट गीत बहुत कम दिखाई देता है। इसकी रचनाएँ भी केवल गिनी – चुनी ही प्राप्त होती हैँ। इसके शब्द कठिन होने के कारण इसे गाने तथा याद करने में कठिनाई का अनुभव होता है। उसे ख्याल गायक ही गेट है। यह चमत्कार पूर्ण गीत है।गाने के लिए निरंतर अभ्यास होना आवश्यक है। एक त्रिवट गीत के बोल इस प्रकार हैँ — तिर किट तक धी धी ना। दूसरा –क्डां धा धा धा, धा s अडाना राग में है।


