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चतुरंग

ख्याल या गीत, तराने के बोल, सरगम तथा मृदंग की परन , इन चारों से रच हुआ गीत चतुरंग होता है।

चतू: + अंग अर्थात् चार अंगों से बना हुआ गीत। इस गीत में चार प्रकार के गीत शैलियों एकीकरण किया हुआ है। प्रथम अंग में ख्याल अथवा कविता होती है। दूसरे भाग में तराने के बोल, तीसरे भाग में सरगम तथा चौथे भाग में मृदंग की परन होती है। कई बार इस क्रम में कुछ परिवर्तन भी दिखाई देता है।

विद्वानों का मत है की चतुरंग गीत प्राचीन नहीं, आधुनिक है। सरगम पुस्तक के लेखकों का मत है की “सम्भवतः तीन चार प्रकार की शैलियां एक ही गीत बंदिश में बांधकर शिष्यों कों बताने के लिए ही संगीत पंडितो ने चतुरंग का अविष्कार किया होगा।”इस गीत में स्थाई, अंतरा, संचारी तथा आभोग, यह चारों भाग होते हैँ। इसकी रचना छोटी नहीं होती।

चतुरंग की लय द्रुत ही रहती है। ख्याल के समान इसमें अलाप नहीं होता और न ही ध्रुपद धमार के सामान इसमें दुगुन व चौगुन ही होती है। कलाकार इसमें तानें अवश्य लेते हैँ। यह तानें ख्याल के समान लम्बी लम्बी नहीं अपितु छोटी छोटी ही होती हैँ। चतुरंग गीत कों ख्याल गायक ही गाते है। आजकल चतुरंग कम सुनाई देता है। इस गाने के लिए जिह्वा की चपलता आवश्यक है चतुरंग भावप्रधान नहीं अपितु चमत्कार प्रदान गीत है।

श्रीमती अतिया बेगम अपने sangeet of india नामक ग्रन्थ में लिखती हैँ — “गीत (ख्याल )के समान ही यह (चतुरंग )अलाप, सरगम, तराना और त्रिवट के मिश्रण द्वारा गाया जाता है. चतुरंग जटिल व कठिन किन्तु लुभावना होता है तथा केवल मात्र उन्ही के द्वारा प्रस्तुत किया जाता है जो (उपरोक्त) चारों शास्त्रीय गायन शैलियो के ज्ञाता हैं।

राग देश का त्रिताल में निबद्ध एक चतुरंग का उदाहरण देखिये जो क्रमिक पुस्तक भाग तीन से लिया गया है।

स्थाई :-चतुरंग कों गाये रासरंगत सो कर तीवर कोमल देखभाल कर तरतीवर अति कोमल सुरसों, न्यारों न्यारों सुर संगत सो।

अंतरा :- दिर दिर दिर तनाना दिर दिर तानोमतान्ना दिर दिर तुं दिर दिर दिर दिर दिर दिर दिर दिर दिर दिर दानि।

संचारी :- ऊँचास कोटि तान तिनके, कठिन रंगीले हैं ब्योरे। मम पप नीनी सां, सांरे सांनी धप म, धा किट तक धुम किट तक धि त्ता क धि त्ता त्ताक धि त्ता किड नग नग धीरकिट तक तक धी किड नग तघडान तक धा।

bhartadm

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