
पंडित विष्णु दिगंबर पळूष्कर के प्रमुख शिष्य पंडित ओमकारनाथ ठाकुर का जन्म 24 जून 1897 कों गुजरात प्रान्त में बदौड़ा के जहाज गांव में उनेवाल ब्राम्हण श्री गौरीशंकर ठाकुर के पुत्र के रूप में हुआ था। आपके पिता ॐ के परम उपासक थे, अतः उन्होंने अपने इस पुत्र का नाम ओमकार नाथ रखा।
देश विदेश में भारतीय संगीत कि कीर्ति फैलाने वाले संगीत मार्तण्ड पं ओमकार नाथ ठाकुर का व्यक्तित्व बड़ा भव्य था।बचपन से ही संगीत के प्रति विशेष लगाव होने के कारन आप सेठ शाहपुर जी मंचेरे डुग्गा कि सहायता से पंडित विष्णु दिगम्बर जी सानिध्य ग्रहण करने में सफल हुए। अनवरत परिश्रम, गुरु कि सेवा और संगीत के प्रति दृढ़ आस्था होने से आप शीघ्र ही संगीत के आकश पर एक चमकते सितारे की तरह चमकने लगे। सन 1917 ईo में लाहौर के गांधर्व महाविद्यालय में अपने आपने प्रधाचार्य (princpal)पद ग्रहण किया जिसे सफलता पूर्वक निभाया। गायन के साथ -साथ व्याख्यान देने की कला में भी आप निष्पात थे और वग्गेयकार के रूप में आपकी एक अलग पहचान थी। आपने संगीत संबंधित कई पूसके भी लिखी जिनमे ‘प्रणव भारती ‘ तथा ‘सांगितजलि ‘ विशेष उल्लेखनीय है। H. M. V. ने आपके अनेक डिस्क रिकॉर्ड तैयार किये जो आज भी आकाशवाणी से प्रसारित होते रहते हैं।
सन 1955 ईo में भारत सरकार ने आपको पद्मश्री की उपाधि देकर सम्मानित किया। आप कई वर्ष तक कशी हिन्दू विश्व विद्यालय के संगीत – विभाग के प्रमुख रहे। आपका गान विचित्र तासीर रखता था। जिस समय आप मैया मोरी मैं नहीं माखन खायो पद गाते थे तो उस समय श्रोताओँ की आखों से ख़ुशी के आंसू बहने लगते थे। आपने अपने जीवन में संगीत संबधित विविध परिक्षण भी किये थे, जिनमे इटली के शासक मुसोलिनी कों अनिद्रा से मुक्ति दिलाना एक प्रमुख घटना है।
जीवन के अंतिम दिनों में आपको पक्षघात हो गया था और उसी रोग ने 28 दिसम्बर, 1967 को संगीत विभूति भारतीय संगीत जगत से हमेशा के लिए छीन ली।


