जिन रागों में सप्तक के उत्तरांग का कोई स्वर अर्थात् ‘प ध नी सां ‘ इन स्वरों में से होता वे उत्तर राग कहलाते हैं। इन्ही रागों कों उत्तरांग, उत्तरांगवादी राग तथा उत्तरांग प्रधान राग भी कहा जाता है।ऐसे राग दिन के उत्तर – भाग अर्थात् रात्रि के बारह बजे से दिन के बारह बजे तक ही गाये – बजाये जाते हैं।
उपर्युक्त वर्गीकरण से यह स्पष्ट हो जाता है की राग के वादी स्वर कों जान लेने पर उस राग के गान – वादन का समय ज्ञात हो जाता है, जैसे आसावारी का वादी स्वर धैवत है, अर्थात् सप्तक का उत्तरांग स्वर है, तो इसके गान -वादन का समय भी प्रातः है। अर्थात् रात्रि के बारह बजे से दिन के बारह बजे तक का जो समय (उत्तर भाग )है, उसी के अंतर्गत प्रातः काल आ जाता है।
इन रागों में प से सां तक कोई स्वर वादी होता है, जैसे भैरव, जौनपुरी, तोड़ी आदि। इन रागों का वादी स्वर ध ( कोमल )है और हिण्डोल, देशकार में ध। कुछ अपवाद स्वरूप म वादी वाले राग हैं, जैसे मालकौस, भैरवी आदि। इनका वादी स्वर म है जो बढ़ाये गए क्षेत्र के अनुसार ही उत्तर अंग में आता है। सां स्वर परज का वादी स्वर है अतः स्पष्टतः वह उत्तरांग राग है।
अब अगर हमें राग का गाने का समय ज्ञात हो तो हम सहज़ ही बता सकते हैं की यह पूर्वांग वादी राग है अथवा उत्तरांग वादी। इसी प्रकार रे ग अथवा ध नी (कोमल या शुद्ध )स्वरों में से कोई स्वर वादी होने पर अथवा पूर्वांगवादी या उत्तरांगवादी वर्ग बताये जाने पर हम उसके गाये जाने का समय स्थूल रूप बता सकते हैं। कोमल म, प स्वर वादी होने पर कुछ कठिनाई अवश्य होगी। ऐसे समय में हमें उसका प्रबल अंग भी देखना चाहिए।
