जिस स्वर पर राग की समाप्ति होती थी, उसे उस राग का न्यास स्वर कहते थे। संस्कृत ग्रंथो के अनुसार ‘न्यास स्वरस्तु विज्ञयों यस्तु गीत समापक’ यह न्यास की परिभाषा है अर्थात् जिस स्वर पर गीत की समाप्ति हो, वह न्यास स्वर जाना जाता है।
प्राचीन राग के नियमों में न्यास स्वर का भी नियम था। प्रत्येक राग के गीत या आलाप की समाप्ति किसी निश्चित स्वर पर ही की जाती थी।
यद्यपि पंडित भातखंडे ने कुछ लक्षण गीतों में न्यास स्वर का उल्लेख किया है, जैसे आसावरी लक्षण गीत ‘मध्यम सुर ग्रह न्यास सु पंचम ‘। किन्तु आजकल गीत अथवा अलाप किसी एक निश्चित स्वर पर समाप्त नही किया जाता अपितु किसी एक राग के विभिन्न गीतों की समाप्ति भिन्न भिन्न स्वरों पर की हुई दिखाई देती है। वैसे राग के अलाप और ताने अंततोगत्वा सा ( षडज ) पर ही समाप्त होती है।
आजकल न्यास स्वर का प्रयोग अन्य रूप में होने लगा है। राग अलाप करते समय जिन स्वरों पर बीच – बीच में आ – आकर रुकते जाते हैं, उन स्वरों को न्यास के स्वर कहते हैं। ‘ न्यसने न्यास: ‘ अर्थात् छोड़ देना न्यास है। अतः अलाप या राग के विभिन्न स्वर समूहों की जहाँ – जहाँ समाप्ति की जाती है, वे स्वर न्यास कहलाते हैं।यही स्वर राग के मुख्य या प्रबल स्वर होते हैं। अतः आजकल न्यास स्वर एक नहीं अधिक होते हैं जैसे जौनपुरी में प, भैरव में रे, प, ध, केदार में म, सारंग में रे, प। सा स्वर सभी रागों का न्यास स्वर है। न्यास स्वर रागों के विश्रान्ति स्थान होते हैं। विभिन्न प्रकार से आलाप करते हुए उचित स्वरों पर आ – आकर ठहरना एक प्रश्नशनीय कार्य समझा जाता है। इस कार्य से राग अलाप की सुंदरता भी बढ़ती है तथा वैचित्रय भी।


