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nayash

जिस स्वर पर राग की समाप्ति होती थी, उसे उस राग का न्यास स्वर कहते थे। संस्कृत ग्रंथो के अनुसार ‘न्यास स्वरस्तु विज्ञयों यस्तु गीत समापक’ यह न्यास की परिभाषा...
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पूर्व राग

जिन रागों में सप्तक के पूर्वांग अर्थात् सा रे ग म में से कोई स्वर वादी हो, तो ऐसे राग पूर्वांग कहलाते हैं। इसी कों पूर्वांग प्रधान, पूर्वांग राग, पूर्वांगवादी...
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सरल एवं शास्त्रीय संगीत की तुलना

शास्त्रीय संगीत के अंतर्गत प्राचीन काल में जाति,प्रबंध,रूपक आदि गाए जाते थे।इनके बाद ध्रुपद गायन का प्रचलन हुआ,पर आज ख्याल गायन का प्रचार है। शास्त्रीय संगीत के सरलीकरण की दृष्टि
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काव्य और संगीत

काव्य और संगीत दोनो ही ललित कलाएं हैं और एक दूसरे के पूरक हैं।काव्य सापेक्ष है और संगीत निरपेक्ष।दोनो की अपनी सीमाएं हैं।यदि अभिव्यक्ति की बात करें तो कई ऐसे
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शास्त्रीय संगीत एवं लोक संगीत

मोटे तौर पर शास्त्रीय संगीत उसे कहते हैं,जो शास्त्र की नियमानुसार प्रस्तुत किया जाय।लोक संगीत उसे कहा जा सकता है,जिसे कोई भी व्यक्ति उन्मुक्त रूप से गुनगुना उठे।दोनो में केवल