जिस स्वर पर राग की समाप्ति होती थी, उसे उस राग का न्यास स्वर कहते थे। संस्कृत ग्रंथो के अनुसार ‘न्यास स्वरस्तु विज्ञयों यस्तु गीत समापक’ यह न्यास की परिभाषा...
जिन रागों में सप्तक के पूर्वांग अर्थात् सा रे ग म में से कोई स्वर वादी हो, तो ऐसे राग पूर्वांग कहलाते हैं। इसी कों पूर्वांग प्रधान, पूर्वांग राग, पूर्वांगवादी...
जिस स्वर से राग प्रारम्भ किया जाता है, उसे ग्रह स्वर कहते हैं। संस्कृत ग्रंथों के अनुसार ‘गीतादौ स्थापितो यस्तु स ग्रह स्वर उच्चयते’ अर्थात् गीत के प्रारम्भ में जो