जिस स्वर पर राग की समाप्ति होती थी, उसे उस राग का न्यास स्वर कहते थे। संस्कृत ग्रंथो के अनुसार ‘न्यास स्वरस्तु विज्ञयों यस्तु गीत समापक’ यह न्यास की परिभाषा...
जिन रागों में सप्तक के पूर्वांग अर्थात् सा रे ग म में से कोई स्वर वादी हो, तो ऐसे राग पूर्वांग कहलाते हैं। इसी कों पूर्वांग प्रधान, पूर्वांग राग, पूर्वांगवादी...
जय जय हे भगवती सुर भारती तव चरणों प्रणमामः।नाद ब्राम्हमयी जय वगैश्वरि शरणम् ते गच्छामः।। त्वमसि शरण्या त्रिभुवनधन्या वंदित-सुर -मुनि – चरणानवरसमधुरा कवितामुखरा स्मित – रूचि -रूचिराभरणा।। जय जय हे………………
जिन रागों में सप्तक के पूर्वांग अर्थात् सा रे ग म में से कोई स्वर वादी हो, तो ऐसे राग पूर्वांग कहलाते हैं। इसी कों पूर्वांग प्रधान, पूर्वांग राग, पूर्वांगवादी
पंडित विष्णु दिगंबर पळूष्कर के प्रमुख शिष्य पंडित ओमकारनाथ ठाकुर का जन्म 24 जून 1897 कों गुजरात प्रान्त में बदौड़ा के जहाज गांव में उनेवाल ब्राम्हण श्री गौरीशंकर ठाकुर के