ऐसा माना जाता है कि संगीत ब्रम्हा के मुख से निकला है।ब्रम्हा ने इस सृष्टि की रचना की है तो संगीत की भी रचना उन्होंने ही की।ऐसा माना जाता है।मां सरस्वती संगीत और विद्या की देवी हैं।उन्होंने वीणा को धारण किया है।शिव जी ने डमरू को धारण किया है और शिव जी तांडव भी करते थे।जो एक नृत्य कला है।शिव जी ने ही रुद्र वीणा का अविष्कार किया।नारद जी ने घोर तप करके शिव जी से संगीत कला प्राप्त की। स्वर्ग में अप्सराएं नृत्य करती थी, किन्नर गायन करते थे, गन्धर्व वादन करते थे।इन सभी को नारद जी ने संगीत की शिक्षा प्रदान की थी।गांधर्व कला में गीत सबसे प्रधान है। भरत मुनि,नारद मुनि और हनुमान मुनि(ये एक ऋषि थे) इन सभी ऋषि मुनियों द्वारा ही संगीत को पृथ्वी पे लाया गया।
फारसी विद्वान का ये मानना है कि संगीत हजरत मूसा द्वारा उत्पन्न है, कुछ विद्वानों का मानना है कि जिस प्रकार मानव बोलना सीखा उसी प्रकार धीरे धीरे उसके अंदर संगीत स्वत: ही उत्पन्न हुआ।
“संगीत दर्पण” के लेखक दामोदर पंडित ने संगीत की उत्पत्ति ब्रम्हा से ही मानी है।संगीत की उत्पत्ति के विषय में बहुत सारी मान्यताएं हैं।

संगीत का इतिहास
सिंधु घाटी सभ्यता काल
जब मोहन जोदड़ो और हड्डपा की खुदाई हुई तो उसमे से शिव जी की तांडव मुद्रा में मूर्ति प्राप्त हुई और कुछ मनुष्यो की नृत्य मुद्रा में खंडित मूर्ति प्राप्त हुई।एक चित्र भी प्राप्त हुआ जिसमे एक पुरुष बाघ के सामने ढोल बजाता हुआ दिख रहा है। खंडहरों की दीवारों पर सांगीतिक चित्र भी मिले हैं। जिससे प्रतीत होता है कि हमारा संगीत मिश्र यूनान मेसोपोटामिया आदि से श्रेष्ठ था।
वैदिक कालीन संगीत
वेदों की रचना इसी काल में हुई थी।ऋग्वेद,सामवेद,यजुर्वेद, अथर्वेद इन चारों वेदों में से सामवेद में पूर्ण रूप से संगीत का वर्णन प्राप्त होता है। “साम” शब्द का मूल आधार गान रहा है।साम गान का प्रारंभ और समापन दोनो ॐ स्वर पर होता है।इस काल में आर्यो का आगमन हुआ था।आर्यो ने संगीत में पवित्रता लाने के लिए संगीत को धर्म से जोड़ दिया था। स्त्रियां भी इस युग में गायन वादन नृत्य इन तीनों कलाओं में भाग लिया करती थी।”शतपथ ब्राह्मण” के अनुसार यज्ञ में नियुक्त गायक,उत्तम गायक होने के साथ ही वादक और उत्कृष्ट प्रबंधकार हुआ करते थे।आर्यो के जीवन का कोई ऐसा क्षेत्र नही बचा था,जिसमे संगीत ने प्रवेश न किया हो।
प्राचीन कालीन संगीत
रामायण और महाभारत जैसे महाकाव्यों में भी संगीत से परिचय कराया गया है। इन दोनो महाकाव्यों में संगीत तथा वाद्य यंत्रों का विशेष उल्लेख है। भेरी,दुंदुभी,मृदंग,वीणा आदि का उल्लेख रामायण में प्राप्त होता है।जब राम जी और सीता जी का विवाह हुआ तब भी संगीत का आयोजन हुआ और सखियों के मंगल गीत से स्वंबर का समापन हुआ।जब राम जी वनवास से वापस आए तो उनके स्वागत में मंगल गान हुआ।रावण भी संगीत का बड़ा विद्वान था और वीणा वादन में पारंगत था।
महाभारत में सात स्वरों और गंधार ग्राम का वर्णन मिलता है। अर्जुन भी संगीत के महान विद्वान थे।वे गायन वादन दोनो में पारंगत थे।उन्होंने अज्ञात वास के समय उत्तरा को संगीत की शिक्षा दी थी।कृष्ण भगवान की वंशी में एक जादू होता था जो सबका मन मोह लेते थे।कृष्ण भगवान के जैसा वंशी वादक कोई न हो सका।
भरत मुनि ने इसी काल में “नाट्यशास्त्र” ग्रन्थ लिखा था। नाट्यशास्त्र के 28वें से 33वें तक संगीत विषय पर ही चर्चा की गई है।इससे यह सिद्ध होता है कि उस समय तक संगीत अत्यंत विकसित हो चुका था।
जैन काल में सबके लिए साधना का मुख्य विषय संगीत बन गया था।इस युग में नवीन ध्वनियों और गायन शैलियों का जन्म हुआ।बौद्ध युग में भगवान बुद्ध के सभी सिद्धांतो को गीतों के लड़ियों में पिरो दिया गया था।पितृ पुत्र समागम कथा में उल्लेख है कि बुद्ध के जन्मोत्सव पर पांच सौ वाद्यों का वृंदवादन हुआ था।
मौर्य काल में चंद्रगुप्त मौर्य ने संगीत के विकास के लिए प्रयत्न किए,इस युग में संगीत अपनी नैतिक मर्यादा से अलग हो रहा था। संगीत सिर्फ मनोरंजन का साधन मात्र रह गया था।इसी समय यूनानी संगीत का आगमन भारत में हुआ और भारतीय संगीत यूनान पहुंचा।बिंदुसार के समय संगीत का कोई विशेष विकास नहीं हुआ।सम्राट अशोक ने संगीत को पुनः उच्चस्तर पर प्रतिष्ठित करने का प्रयत्न किया। संजितज्ञ बनने से पूर्व आध्यात्मिक स्वरूप का अध्यन करना पड़ता था।अशोक के समय में भारतीय संगीत विश्वव्यापी बन गया था।
गुप्त काल में भरत के पुत्र दत्तिल द्वारा संगीत का ग्रन्थ “दत्तिलम” की रचना की गई।चंद्रगुप्त ने संगीत के लिए विशेष कार्य नहीं किया क्योंकि वो अधिकतर युद्ध में व्यस्त रहते थे।इनके बाद समुद्रगुप गद्दी पर बैठे जो स्वयं उत्तम वीणा वादक थे।इस काल में शास्त्रीय संगीत का प्रचार अधिक हुआ।कुछ विद्वानों का कहना है कि सितार वाद्य का जन्म इसी काल में हुआ।इसी काल में भारतीय संगीत रोम, फ्रांस, आयरलैंड,हंगरी आदि देशों में पहुंचा।गुप्त काल में भारतीय संगीत का जितना विकास हुआ उतना किसी भी काल में नही हुआ।इसलिए गुप्त काल को संगीत का स्वर्ण काल भी कहते हैं।
मध्य कालीन संगीत
यवन काल में संगीत अनेक वर्गो में बंट गया। प्रत्येक वर्ग अपने अपने दृष्टिकोण से संगीत का विकास करने लगा।इन्ही संकीर्ण दृष्टिकोणों के परिणाम स्वरूप संगीत के घरानों की नींव पड़ गई।
खिलजी के समय में आमिर खुसरो नाम के संगीतज्ञ हुए।खुसरो प्रतिभा शाली और योग्य संगीतज्ञ थे।गोपाल नायक भी खुसरो के समय के गायक थे।इस समय कव्वाली और तराना का जन्म हुआ।
मुगलों के समय को देखे तो बाबर स्वयं संगीतज्ञ था लेकिन उसके लिए संगीत सिर्फ मनोरंजन का साधन था।वो संगितज्ञो को पुरस्कृत भी करता था।बंगाल में भी चैतन्य महाप्रभु एवम अन्य भक्त संकीर्तन का प्रचार उस समय कर रहे थे।हुमायु के समय सूफियों का बड़ा जोर था।जौनपुर के बादशाह सुलतान हुसैन शर्की (1500के लगभग) ने कुछ नवीन रागों की रचना की और खयाल पद्धति को प्रतिष्ठित किया।
अकबर के समय में बहुत ही महान संगीतकार हुए जिनका नाम तानसेन था।तानसेन अकबर के नौरत्नो में शामिल थे।उनके संगीत में इतनी शक्ति थी कि उनके रागों के अनुसार वातावरण बदल जाया करता था।उन्होंने कुछ रागों का अविष्कार भी किया जैसे मियां मल्हार, मियां सारंग,दरबारी कांगड़ा आदि।
स्वामी हरिदास,सूरदास,तुलसीदास,कबीरदास,मीराबाई सभी इसी काल के माने जाते हैं।इनके भजन और पद अमर हो गए जो आज भी घर घर में प्रचलित हैं।
मध्यकाल में ही सदारंग,अदारंग,महारंग उत्तम संगीतज्ञ हुए।इसी काल में ही टप्पे के साथ ठुमरी का भी प्रचलन हुआ।भारत और फारस के संगीत का भी मिश्रण इस काल की सबसे प्रमुख विशेषता है।
आधुनिक कालीन संगीत
अंग्रजों को भारतीय संगीत में कोई रुचि नहीं होती थी।इस समय संगीत की दशा अत्यंत शोचनीय हो गई थी।केवल देसी राजाओं के दरबार में ही भारतीय संगीत का आश्रय रह गया था।यवन काल में जो घरानों की नींव पड़ी थी वो इस काल में दृढ़ हो गई थी।दक्षिण में तंजौर के महराजा तुलाजी राव भोंसले ने समस्त भारत के संगीत विद्वानों को पारितोषिक दिए जिसके कारण तनजौर उस समय संगीत का प्रमुख केंद्र बन गया।संगीत सार का रचना काल ये ही काल है।इसी समय सौरेंद्र मोहन ठाकुर ने यूनिवर्सल हिस्ट्री ऑफ म्यूजिक ग्रंथ की रचना की।
संगीत के उद्धार के लिए महाराष्ट्र के दो महान विभूतियों का बड़ा योगदान माना जाता है।उनके नाम पण्डित विष्णु नारायण भातखंडे और पंडित विष्णु दिगंबर पलुस्कर जी।दोनो लोगो ने भारत के हर स्थान पर पर्यटन करके संगीत का प्रचार प्रसार किया।अनेक संगीत महाविद्यालयों की स्थापना की। इन्होंने संगीत सम्मेलनों का आयोजन किया जिसके कारण जन साधारण तक संगीत की विशेषता पहुंची।इसी समय विश्वकवि रविन्द्र नाथ ठाकुर ने राग रगिनियो के विशेष स्वर समुदाय के कलात्मक रूप को लेकर एक नई गान शैली बनाई।जो आज रविन्द्र संगीत के रूप में प्रचलित है।
स्वतंत्रता के बाद का संगीत
स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद संगीत धीरे धीरे विकास कर रहा है।संगीत विषय को विद्यालय और विश्वविद्यालयों के पाठ्यक्रमों में शामिल किया जा रहा है।संगीत में पीएचडी की उपाधियां भी मिलने लगी हैं।भारत सरकार ने प्रोत्साहन के लिए संगीत में पद्मश्री पद्म भूषण पद्मविभूषण जैसे राष्ट्रीय सम्मान देना आरंभ कर दिया है। एम एस सुब्बुलक्ष्मी 1954 में पद्म भूषण और 1975 में पद्म विभूषण पाने वाली पहली संगीतकार थी।1998 में एम एस सुब्बुलक्ष्मी जी को भारत रत्न से भी सम्मानित किया गया।1953 में “संगीत नाटक अकादमी” की स्थापना हुई और 1954 में ललितकला अकादमी की स्थापना हुई।
आधुनिक युग में संगीत को अब लोग हेय दृष्टि से नहीं देखते हैं।आजकल टैलेंट शो के कारण भी संगीत की महत्ता जन साधारण को ज्यादा समझ आने लगी है।अब अधिकतर लोग संगीत सीखना चाहते हैं और उसमे अपना उज्ज्वल भविष्य बनाना चाहते है


