छोटे ख्याल के समान द्रुत लय में गाया जाने वाला ” तन देरे ना ” आदि निरर्थक शब्दों का गीत तराना होता है। इस गीत के अविष्कार के विषय में कई मत है। संगीत विशारद (हाथरस ) के लेखक श्री वसंत लिखते है कि अमीर खुसरो जब हिंदुस्तान आये तो यहाँ कि संस्कृत भाषा कों सुनकर घबराये क्योंकि वो अरबी विद्वान थे। अतः उन्होंने निरर्थक शब्द गढ़कर तरह – तरह के हिंदुस्तानी राग गाये। वे निरर्थक शब्द ही ताराना नाम से प्रसिद्ध हुआ। तराने में लय, ताल और राग का ही आनंद है, शब्दों कि ओर कोई ध्यान नहीं देता। इसका गायन हमारे देश में मनोरंजक माना जाता है। बहादुर हुसैन खां, नत्थू खां आदि तराने प्रसिद्ध हैँ।
उपरोक्त कथन पूर्ण रूप से नहीं तो आंशिक रूप से सत्य अवश्य है क्योंकि कई विद्वानो का मत है कि उर्दू तथा फ़ारसी भाषा भाषी भाइयों को हिंदी संस्कृत भाषा के अनुसार जिह्वा कों चपलता पूर्वक घूमाना कठिन प्रतीत हुआ, अतः तराने का अविष्कार हुआ।
तराने कि बंदिशे छोटे ख्याल के समान अधिक बड़ी नहीं होती। इनमे भी स्थाई तथा अंतरा दो ही भाग होते हैँ। इनमे साहित्य तथा भाषा का प्रश्न ही नहीं उठता क्योंकि “तन देरे ना “, “त दी या रे “, द्रे द्रे तनोम “इत्यादि शब्दों का ही गीत होता है। कुछ तरानो में फ़ारसी के शेर अथवा पखावज के बोल भी दिखाई देते हैँ।
तराना प्रायः उन सभी रागों में होता है जिसमें छोटा ख्याल होता है। यह त्रिताल, द्रुत एकताल, आदि तालो में ही निबद्ध होता है। तराने हमेशा छोटे ख्याल के बाद गाते हैँ। इसका गायन द्रुत लय होने के कारण इसमें अलाप नहीं हो पाता, केवल द्रुत तानें ही होती हैँ। कुछ लोग तराने के शब्दों कों लेते हुए द्रुत लय में बढ़ते हैँ।जैसे ग म प प प प प प प अथवा ऐसे ही नी और सां इत्यादि स्वरों कों लेते हुए ‘त न न न ‘, तोम तन ‘ अथवा ‘दीम दीम ‘इन शब्दों के सहारे एक रौ -सी बाँध देते हैँ। द्रुत लय में यह कार्य बहुत सुन्दर लगता है। इस गीत में स्वर तथा लय का चमत्कार रहता है। तराना गीत में बोल तथा ताने लेने के लिए जिह्वा एवं गाने की तैयारी की अवश्यकता होती है।
तराना लय – प्रधान गीत होने के कारण गायन के अंत में शोभा देता है। इसके गाने से विभिन्न शब्दों कों स्पष्ट रूप से और जल्दी – जल्दी गाने का अभ्यास हो जाता है। गायक का स्वर, राग एवं गले पर पूर्ण अधिकार होने पर तराना बहुत मनोहर लगता है।आजकल सभी ख्याल गायक तराना भी भलीभांति गाते हैँ।


